समकालीन हिंदी कथा साहित्य में स्त्री चेतना और सामाजिक परिवर्तन
DOI:
https://doi.org/10.63345/Keywords:
स्त्री चेतना, हिंदी कथा साहित्य, सामाजिक परिवर्तन, स्त्री अस्मिता, आत्मनिर्णय, सामाजिक समानताAbstract
समकालीन हिंदी कथा साहित्य में स्त्री चेतना केवल लैंगिक असमानता के प्रतिरोध तक सीमित न रहकर आत्मनिर्णय, सामाजिक सहभागिता और वैकल्पिक जीवन-दृष्टि के रूप में विकसित हुई है। इक्कीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में स्त्री पात्रों की भूमिका परिवार, कार्यक्षेत्र, शिक्षा, सामाजिक संचार और सार्वजनिक निर्णय की प्रक्रियाओं में अधिक जटिल रूप में सामने आती है। प्रस्तुत अध्ययन का केंद्रीय उद्देश्य यह विश्लेषित करना है कि समकालीन कथा साहित्य स्त्री की चेतना को व्यक्तिगत मुक्ति से आगे बढ़ाकर सामाजिक परिवर्तन की सक्रिय शक्ति के रूप में किस प्रकार अभिव्यक्त करता है।
अध्ययन विशेष रूप से वर्ष २०२१ से २०२६ के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों की पृष्ठभूमि में स्त्री अस्मिता, आर्थिक स्वायत्तता, देह-बोध, पारिवारिक सत्ता और सामाजिक भागीदारी के प्रश्नों को केंद्र में रखता है। शोध का विशिष्ट अंतर यह है कि पूर्ववर्ती अध्ययनों में स्त्री विमर्श और सामाजिक परिवर्तन को प्रायः पृथक विषयों के रूप में देखा गया, जबकि यहाँ उनके पारस्परिक कारणात्मक और वैचारिक संबंध का अध्ययन किया गया है। यह शोध कथा-पात्रों, कथानक संरचना, संवाद, निर्णय-स्थितियों और सामाजिक संघर्षों में उपस्थित स्त्री चेतना के विविध स्तरों की पहचान करता है।
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